International • October 16, 2026 • By Saloni Shiva

रात में धरती पर आएगी सूरज की रोशनी! भारत की कंपनी से अमेरिका ने मिलाया हाथ

Sunlight From Space at Night
Sunlight From Space at Night : जरा सोचिए, अगर रात के अंधेरे में भी सूरज की रोशनी धरती पर पहुंचने लगे, तो कैसा होगा? सुनने में यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी लगती है, लेकिन अमेरिका की एक कंपनी इसे हकीकत में बदलने की तैयारी कर रही है। कंपनी अंतरिक्ष में ऐसे सैटेलाइट भेजना चाहती है, जिनमें बड़े-बड़े शीशे लगे होंगे। ये शीशे सूरज की रोशनी को धरती के खास इलाकों की ओर मोड़ेंगे, जिससे रात में भी वहां उजाला किया जा सकेगा।

भारत की स्काईरूट एयरोस्पेस के साथ समझौता

इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए अमेरिका की कैलिफोर्निया स्थित कंपनी रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल ने भारत की स्काईरूट एयरोस्पेस के साथ समझौता किया है। इसके तहत दो सैटेलाइट लॉन्च किए जाएंगे। पहला लॉन्च विक्रम-1 रॉकेट से होगा, जबकि दूसरा स्काईरूट के नए विक्रम-1U रॉकेट से किया जाएगा। इस रॉकेट के पहले चरण में अतिरिक्त बूस्टर लगाए जाएंगे, जिससे इसकी क्षमता बढ़ सकेगी। दोनों कंपनियों को उम्मीद है कि इस साझेदारी से अंतरिक्ष में सैटेलाइट भेजने की योजना को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।

पांच किलोमीटर के इलाके में होगा उजाला

रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल की योजना रात में करीब पांच किलोमीटर चौड़े इलाके में रोशनी पहुंचाने की है। खास बात यह है कि जरूरत के हिसाब से रोशनी की चमक कम या ज्यादा की जा सकेगी और काम पूरा होने पर इसे बंद भी किया जा सकेगा। कंपनी का दावा है कि इस तकनीक से आपदा के समय लोगों को खोजने, दूरदराज के औद्योगिक इलाकों में काम बढ़ाने और सोलर पावर प्लांट से ज्यादा देर तक बिजली बनाने में मदद मिल सकती है।

वन्यजीवों और वैज्ञानिकों की बढ़ सकती है चिंता

हालांकि, इस तकनीक को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं। पर्यावरण संगठनों का कहना है कि रात में कृत्रिम रोशनी बढ़ने से वन्यजीवों की दिनचर्या प्रभावित हो सकती है। वहीं, खगोलविदों को अंतरिक्ष का अध्ययन करने में परेशानी हो सकती है और इंसानों की नींद पर भी असर पड़ सकता है।

पहले भी हो चुका है ऐसा प्रयोग

साल 1993 में रूस ने ज्नाम्या नाम का प्रयोग किया था, जिसमें अंतरिक्ष में भेजे गए शीशे से धरती पर सूरज की रोशनी पहुंचाई गई थी। अब रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल इस विचार को बड़े स्तर पर आगे बढ़ाना चाहती है। हालांकि, यह तकनीक भविष्य में कितनी सफल होगी, यह इसके परीक्षण और पर्यावरण पर पड़ने वाले असर से तय होगा।

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