मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि क्या मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के बीच सबकुछ ठीक चल रहा है? सीहोर के बुधनी स्थित कोसमी गांव में आदिवासी परिवारों के घर तोड़े जाने के मामले में शिवराज के बयान ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है। शिवराज ने कार्रवाई को अन्याय बताते हुए कहा कि इन्हीं लोगों के वोट से बीजेपी जीतती है और इन्हीं के वोट से मोहन यादव मुख्यमंत्री बने हैं।
आदिवासी परिवारों के समर्थन में उतरे शिवराज
कोसमी गांव में बरैला आदिवासी समुदाय के परिवारों के घरों पर वन विभाग की कार्रवाई को लेकर शिवराज ने नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि सालों से वहां रह रहे परिवारों को इस तरह परेशान नहीं किया जाना चाहिए था। शिवराज ने कुछ अधिकारियों पर बीजेपी और मुख्यमंत्री की छवि खराब करने की साजिश करने का आरोप भी लगाया। हालांकि, उन्होंने मुख्यमंत्री मोहन यादव को सीधे तौर पर इस कार्रवाई के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया।
पहले भी सामने आ चुके हैं मतभेद
यह पहली बार नहीं है जब शिवराज और मोहन यादव सरकार के फैसलों को लेकर चर्चा शुरू हुई हो। इससे पहले आदिवासी परिवारों और वन विभाग की कार्रवाई को लेकर भी शिवराज ने प्रभावित लोगों का पक्ष उठाया था। वहीं, मूंग की MSP पर खरीद को लेकर भी केंद्र और राज्य सरकार की भूमिकाओं पर सवाल उठे थे। शिवराज ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर खरीदी की प्रक्रिया तेज करने की बात कही थी। इसके अलावा, CM राइज स्कूलों का नाम बदलकर महर्षि सांदीपनि विद्यालय किए जाने के फैसले पर भी राजनीतिक चर्चा हुई थी।
कांग्रेस ने शिवराज के इरादों पर उठाए सवाल
कांग्रेस नेता मुकेश नायक ने शिवराज सिंह चौहान के बयान पर निशाना साधा है। उनका कहना है कि शिवराज की नजर आज भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है। मुकेश नायक ने दावा किया कि कमलनाथ के मुख्यमंत्री रहते भी शिवराज की नजर उनकी कुर्सी पर थी और अब मोहन यादव के कार्यकाल में भी ऐसा ही हो रहा है। उन्होंने सरकार के कामकाज पर सवाल उठाते हुए कहा कि 18 साल तक मुख्यमंत्री रहे शिवराज का अपनी ही पार्टी की सरकार के खिलाफ धरने पर बैठना कई सवाल खड़े करता है।
क्या वाकई BJP में चल रही है खींचतान?
फिलहाल, इन बयानों के आधार पर शिवराज और मोहन यादव के बीच सीधी लड़ाई का दावा करना जल्दबाजी होगी। शिवराज का कहना है कि आदिवासी परिवारों के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए, जबकि कांग्रेस इसे सत्ता और नेतृत्व से जोड़कर देख रही है। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या शिवराज सिर्फ आदिवासियों और किसानों के मुद्दे उठा रहे हैं या बीजेपी के भीतर भी फैसलों को लेकर असहमति है? इसका जवाब आने वाले दिनों में दोनों नेताओं के बयानों और सरकार के कदमों से ही साफ होगा।

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